1 अप्रैल 2026 से बदलेगा गेम, प्रॉप ट्रेडिंग पर बड़ा ब्रेक -RBI New Rules For Brokers
फरवरी 2026 के बीच में RBI New Rules For Brokers की खबर आते ही कैपिटल मार्केट शेयरों में हलचल मच गई। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों द्वारा ब्रोकर्स और अन्य कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरीज़ को दिए जाने वाले क्रेडिट पर सख्त नियम लागू कर दिए हैं। इन नियमों का मकसद है ज्यादा लीवरेज, सट्टेबाजी और सिस्टम में बढ़ते जोखिम को कंट्रोल करना।
1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले ये नियम सीधे तौर पर बैंकों और ब्रोकर्स के बीच फंडिंग स्ट्रक्चर को प्रभावित करेंगे। रिटेल निवेशकों पर इसका सीधा असर नहीं है, लेकिन मार्केट वॉल्यूम, एफ एंड ओ ट्रेडिंग और ब्रोकरेज कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। अगर आप ट्रेडर हैं, निवेशक हैं या सिर्फ मार्केट को समझना चाहते हैं, तो यह बदलाव समझना जरूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत के कैपिटल मार्केट में प्रॉप ट्रेडिंग और डेरिवेटिव्स वॉल्यूम में तेज बढ़ोतरी देखी गई। कई रिपोर्ट के अनुसार इक्विटी ऑप्शंस टर्नओवर का बड़ा हिस्सा प्रॉप ट्रेडिंग डेस्क से आता था। इस तेजी से बढ़ते लीवरेज को लेकर RBI चिंतित था।
RBI का फोकस साफ है। बैंकिंग सिस्टम को किसी संभावित मार्केट करेक्शन से बचाना। अगर ब्रोकर्स ज्यादा उधार लेकर ट्रेड करते हैं और अचानक मार्केट गिरता है तो जोखिम बैंकों तक पहुंच सकता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए Commercial Banks Credit Facilities Directions 2026 में संशोधन किया गया।
अब से बैंकों द्वारा दिए गए हर क्रेडिट को 100% योग्य कोलैटरल से कवर करना होगा। इसका मतलब यह है कि बैंक जितना पैसा देंगे, उतनी वैल्यू की संपत्ति सुरक्षा के रूप में रखी जाएगी।
बैंकों को लगातार कोलैटरल की वैल्यू मॉनिटर करनी होगी। अगर वैल्यू घटती है तो अतिरिक्त सुरक्षा मांगनी होगी।
| एसेट का प्रकार | न्यूनतम हेयरकट |
|---|---|
| लिस्टेड इक्विटी शेयर | 40% |
| AAA रेटेड डेब्ट सिक्योरिटी | 15% |
| सोवरेन गोल्ड बॉन्ड | 25% |
| कमर्शियल पेपर | 15% से 25% |
अगर कोई ब्रोकर 100 रुपये के शेयर गिरवी रखता है तो बैंक केवल 60 रुपये की वैल्यू मानेगा। इससे लीवरेज अपने आप कम हो जाएगा।
यह सबसे बड़ा बदलाव है। अब बैंक ब्रोकर्स को उनकी अपनी ट्रेडिंग पोजिशन के लिए फंडिंग नहीं देंगे। पहले कुछ ब्रोकर्स बैंक गारंटी या फिक्स्ड डिपॉजिट स्ट्रक्चर के जरिए लीवरेज लेकर प्रॉप ट्रेडिंग करते थे। अब ऐसे रास्ते बंद हो गए हैं।
हालांकि वर्किंग कैपिटल, सेटलमेंट मिसमैच या मार्केट मेकिंग जैसी सीमित जरूरतों के लिए कुछ छूट दी गई है, लेकिन सीधे निवेश या ट्रेडिंग के लिए फंडिंग नहीं मिलेगी।
इसका असर खासकर उन ब्रोकर्स पर पड़ेगा जिनका बड़ा हिस्सा प्रॉप डेस्क से आता था।
अब एक्सचेंज या क्लियरिंग कॉरपोरेशन को दी जाने वाली बैंक गारंटी के लिए कम से कम 50% कोलैटरल जरूरी है। इसमें से 25% कैश होना चाहिए। पहले कुछ प्रोफेशनल क्लियरिंग मेंबर के लिए यह सीमा कम थी।
मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी के लिए बैंक फंडिंग पूरी तरह सुरक्षित होनी चाहिए। इसमें कम से कम 50% कैश या कैश इक्विवेलेंट होना जरूरी है। इक्विटी शेयर पर 40% हेयरकट लागू रहेगा।
इससे क्लाइंट लेवल पर मिलने वाला लीवरेज महंगा हो सकता है।
घोषणा के तुरंत बाद कैपिटल मार्केट से जुड़े शेयरों में गिरावट आई।
Reserve Bank of India के इस फैसले के बाद
BSE Ltd के शेयर लगभग 9 से 10 प्रतिशत तक गिरे।
Angel One में 6 प्रतिशत तक गिरावट देखी गई।
Billionbrains Garage Ventures के शेयर भी 4 से 5 प्रतिशत नीचे आए।
विश्लेषकों का अनुमान है कि एफ एंड ओ वॉल्यूम में 15 से 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। अगर प्रॉप ट्रेडिंग घटती है तो एक्सचेंज की कमाई पर असर पड़ सकता है।
RBI ने बैंकों के लिए कुल कैपिटल मार्केट एक्सपोजर की सीमा भी बरकरार रखी है।
इससे बैंक किसी एक सेक्टर में अत्यधिक जोखिम नहीं ले पाएंगे।
सीधे तौर पर नहीं। ये नियम बैंक और ब्रोकर के बीच फंडिंग पर लागू होते हैं। आपके डिमैट अकाउंट या सामान्य ट्रेडिंग पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है।
लेकिन अप्रत्यक्ष असर संभव है। अगर ब्रोकर्स के लिए फंडिंग महंगी हो जाती है तो:
लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए यह कदम बाजार को अधिक स्थिर बना सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली।
कुछ ट्रेडर्स का कहना है कि यह कदम हाई लीवरेज ट्रेडिंग के लिए बड़ा झटका है। कई लोगों ने लिखा कि अब आसान बैंक फंडिंग खत्म हो जाएगी।
कुछ उद्योग विशेषज्ञों ने इसे स्ट्रक्चरल बदलाव बताया। उनका मानना है कि अब ब्रोकर्स को अपनी पूंजी पर ज्यादा निर्भर रहना होगा।
दूसरी ओर कुछ निवेशकों ने इस फैसले का स्वागत किया। उनका तर्क है कि यह कदम सट्टेबाजी कम करेगा और सिस्टम को सुरक्षित बनाएगा।
कुल मिलाकर माहौल सावधानी भरा है। ट्रेडर्स थोड़े चिंतित हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म निवेशक इसे सकारात्मक नजर से देख रहे हैं।
अगर वॉल्यूम घटते हैं तो शुरुआत में ब्रोकरेज कंपनियों की आय पर असर दिख सकता है। लेकिन लंबे समय में यह नियम बाजार को ज्यादा संतुलित बना सकते हैं।
कम लीवरेज का मतलब कम जोखिम। और कम जोखिम का मतलब मजबूत वित्तीय प्रणाली। RBI का मकसद यही लगता है।
अब असली तस्वीर 1 अप्रैल 2026 के बाद साफ होगी जब ये नियम पूरी तरह लागू हो जाएंगे।
RBI New Rules For Brokers भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक बड़ा नीतिगत बदलाव है। 100% कोलैटरल, प्रॉप ट्रेडिंग पर रोक और सख्त हेयरकट नियम मिलकर लीवरेज आधारित ट्रेडिंग मॉडल को बदल देंगे।
रिटेल निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आप डेरिवेटिव ट्रेडिंग या हाई लीवरेज स्ट्रैटेजी का इस्तेमाल करते हैं तो आने वाले समय में नियम और लागत दोनों बदल सकते हैं।
मार्केट में शॉर्ट टर्म उतार चढ़ाव हो सकता है। पर लॉन्ग टर्म में यह कदम स्थिरता की दिशा में एक कोशिश है।
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